Mar 27, 2010

आजकल



क्यों आजकल देर से नींद आती हैं...
क्यों अजीब बातों पर वो मुस्कुराती हैं...
आजकल वो दुआए भी करने लगी हैं...
कुछ कह दो तो शर्माती हैं...
पता है, उसे यकीन नहीं होता...
की शायद उसे प्यार हुआ हैं....

कहने को तो घंटो लाइब्ररी में रहती हैं...
मगर किताबें उलटी पकड़ कर, जाने कौनसा सबक याद कराती होगी...
कॉफ़ी का शरबत हो जाता हैं..
फिर भी फूँक मारती रहती हैं..
कोई कितना रोके, कितना टोके...
उलझी रहती हैं...
पता हैं, उसे यकीन नहीं होता...
की शायद उसे प्यार हुआ हैं...

चलते-चलते बच्चो से शरारत करना...
लम्बी आहे भरना... जुल्फों से हरकत करना..
पीछे मुड़ कर, मुस्कुराकर धीरे से बाय कहना..
रोमांटिक नगमों की धुनों पर, सुर से सुर मिलाना...
कोई कितना रोके, कितना टोके...
सुनती ही नहीं हैं..
पता हैं, उसे यकीन नहीं होता हैं..
की शायद उसे प्यार हुआ हैं...

एक मैं हूँ की उसे देखता रहता हूँ..
कुछ लिख कर, कागजों को, पानी में फेंकता रहता हूँ...
आजकल सूरज से दिन नहीं निकलता हैं मेरा..
घंटो नाखुनो को, दांतों से, कुरेदता रहता हूँ...
कोई कितना रोके, कितना टोके..
मुझे कुछ पता नहीं..

पता हैं, उसे यकीन नहीं होता हैं...
की शायद मुझे प्यार हुआ हैं.....
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