Mar 27, 2010

इक्तेफाकन उस रोज़


इक्तेफाकन उस रोज़
ठण्ड बढ़ गयी थी..
इक्तेफाकन तुम भी
दुपट्टे में लिपट कर
घर से चली थी...

हुआ यूँ था,
की कुछ रोज़ पहले,
स्कूल में तुम नयी-नयी आई थी...

फरवरी की सर्दी,
ओर दुपट्टे वाली शबनम..
खूब चर्चे हुए थे,
क्लास रूम की मेज़ पे बैठकर...
सब तेरी आँखों का कमाल था..
पता नहीं गुलाबी चेहरे के दीदार में
कितने पन्नो पर तेरी शक्ल बनी होगी,
पता नहीं...!!!

सर्द हवाए तुझे छुकर,
मुझ तक आती,
तेरे केश में लगे... 
आंवले की खुशबू से महक उठता,
मैं भी और क्लास भी...

चलते-चलते,
इक्तेफाकन तेरा दुपट्टा छिटक गया..
गुलाब के पौधे में अटक गया..
 
इक्तेफाकन उस रोज़,
थोड़ी धुप हो रही थी..
इक्तेफाकन शबनम,
मुझे देख रही थी...

इक्तेफाकन फरवरी थी..
इक्तेफाकन तरीक भी 14 थी..

इफ्तेफाकन दुपट्टे में उलझकर,
गुलाब टुटा था उस वक़्त...

इक्तेफाकन मेरी ओर गिर पड़ा था..
इक्तेफाकन मैं सामने खड़ा था..
 
बस इक्तेफाकन प्यार हो गया था.....
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