Oct 14, 2013

केरोसिन


फिर से डीजल और पेट्रोल के भाव बढ़ गए, पता नहीं ये सरकार और कितना मारेगी।’ शांति काका को घंटों अखबार पढ़ते हुए उन खबरों पर टीवी एंकरों की तरह समिक्षा करने का बड़ा शौक था। माफ कीजिएगा आपको शांति काका का परिचय देना भूल गया।
53 वर्षीय शांति काका का आम भारतीय की तरह रंग गेंहूआ, चिंता और फिर उम्र के कारण सिर पर 10-15 काले बाल, वजन कुछ 42 से 45 किलो, आंखे धसी हुई। देश के बिगड़ते हुए आर्थिक हालात का नेगेटिव असर बीएसई इंडेक्स से पहले शांति काका की सेहत पर पड़ता था। गोर्की या मुंशी जी की कहानियों का जीवंत उदाहरण थे शांति काका। भोले भंडारी के परम भक्त। हर शाम शिवलिंग पर भांग का गोला चढ़ाकर स्वत: प्रसाद ग्रहण करना उनके दैनिक कार्यों का अभिन्न अंग था।
मंदिर के अहाते में बैठे शांति काका ने अखबार समेट कर बगल में रखा हुआ चाय का कप उठाकर चुस्किया लेना शुरु किया। चाय पीते हुए कहने लगे, कल से चाय पीना छोड़ दूंगा, दांतों में दर्द बहुत हो रहा है।शिवजी का प्रसाद लेने के बाद वे अकसर ऐसी बात करते थे। मैंने उनके इस पारंपरिक फैसले को नजर अंदाज करते हुए पूछा, आज मुंबादेवी का प्रसाद नहीं लाए।दरअसल शांतिकाका रोजाना विरार से भुलेश्वर आते, सिर्फ हमारे मंदिर में पूजा करने के लिए, और जब मंदिर के कपाट बंद रहते तब मुंबादेवी मंदिर चले जाया करते। मुंबादेवी के पंडित उन्हें प्रसाद स्वरूप कुछ नारियल और पेड़े दे दिया करते, जिन्हें वे बांट देते थे।
बस दो ही बचे हैं, एक तू ले ले और एक मोती को दूंगा।कपड़े की थैली से कागजों में लिपटा हुआ प्रसाद निकालकर उन्होंने मेरे हाथों में थमा दिया। मैं फटाक से पेड़ा मूंह में रखते हुए पहले माले पर जाने के लिए सीढि़यां पर चढ़ने लगा। इतने में शांति काका ने मुझे आवाज देते हुए रोका और कहने लगे, कल ट्रेन का पास खतम होने वाला है, अब दो-तीन दिन बाद ही आउंगा।
शांति काका महीने में एक बार ऐसा जरूर कहते थे, और फिर हफ्ते भर के लिए गायब हो जाते। उनसे संपर्क करना बड़ा मुश्किल करना था क्योंकि मोबाइल तो दूर की बात, उन्होंने घर पर लैंडलाइन भी नहीं ली थी। कहते थे कि किराए का घर होने के कारण बार-बार बदलना पड़ता है, कौन लैंडलाइन का दुख पाले। ज्यादा आपातकालीन स्थिति में सन 2012 में भी उनके पड़ौसियों के यहां फोन करना पड़ता था। घर पर काकी और उनका बेटा था। बेटा नौकरी की तलाश में कभी मुंबई तो कभी अपने ननिहाल के चक्कर काटता था, और काकी भी अकसर इन दोनों ठिकानों के बीच ही घूमती रहती थी।
जुलाई का महीना था। मुंबई में बारिश शुरु हो चुकी थी। करीब चार-पांच दिनों बाद एक दिन शाम को 4 बजे काका भीगते हुए मंदिर आए, कपाट बंद थे इसलिए मम्मी से बातें करने के लिए वे सीधे ऊपर चले आए। काका अकसर अपनी दुख भरी बातें मम्मी को बताते थे, मम्मी भी शाम की चाय पीने के लिए उनका इंतजार करती थी। अपनी कपड़े की थैली से बदन पोंछते हुए काका कहने लगे, मोती नहीं रहा।ये सुनकर पहले तो मुझे ये समझने में टाइम लगा कि मोती कौन था और जब समझ में आया तो काका से पूछा डाला, क्यों क्या हुआ मोती को।मोती जब छोटा सा था तब काका उसे सड़क से उठाकर अपने घर ले गए। घरवालों के विरोध और काका के आग्रह के बाद मोती को बालकनी में रखने पर समझौता हुआ था। बहरहाल काका अपने कुत्ते की मौत का कारण बारिश को बता रहे थे। कहने लगे की नए घर में बालकनी नहीं है, इसलिए मोती बिल्डिंग के गेट पर ही सोता था। बारिश में भीगने के कारण दो-तीन दिन से सुस्त पड़ गया, और उसकी मौत हो गई। काका की बातों को समझना टेक्निकली थोड़ा मुश्किल होता था, इसिलए बात हमेशा अफसोस के साथ ही खतम करनी पड़ती थी। काका ने बताया कि उन्होंने ट्रेन का पास निकालने के लिए जो पैसे जमा किए थे, वो म्यूनिसिपल के कर्मचारी को देने पड़े क्योंकि वो कुत्ते की लाश उठाने में आनाकानी कर रहा था। किसी भी तरह की आर्थिक सहायता लेना काका के उसूलों के खिलाफ था, उन्होंने उस दिन भी मदद लेने से इनकार कर दिया। और चाय पीकर मुंबादेवी मां के मंदिर की ओर चल दिए।
मुझे इराक में स्थित तेल के कुओं, कोयला घोटाला और डीजल-पेट्रोल के चढ़ते दामों पर जितनी दिलचस्प समिक्षाएं समाचार पत्रों में पढ़ने को नहीं मिलती थी, उससे ज्यादा काका बता देते थे। किराए का मकान होने के कारण बार-बार अड्रैस बदलवाने के झंझट के कारण काका ने एलपीजी का कनेक्शन ही नहीं लिया था। वे अपने घर पर कभी सिगड़ी पर कोयले जलाकर, तो कभी केरोसिन जलाकर खाना बनाया करते थे। तेल के दामों ने उन्हें समिक्षक बना दिया था, वे सरकार की आलोचना करने के बजाय मूल कारणों पर विचार करने के पक्ष में थे। भांग की गोली का खाने के बाद उनके अंदर का दार्शनिक जाग जाता था। वे घंटों एक ही टॉपिक पर बोलते रहते थे, बशर्ते कोई सुनने वाला हो।
इस बार पंद्रह दिन से ज्यादा बीत गए काका को मंदिर आए हुए। उन्होंने कभी इतना लंबा अंतराल नहीं लिया। मम्मी ने बताया कि काका हॉस्पिटल में एडमिट है, संडे को उनसे मिलने चलना है। मेरे दिमाग में सीधा सा तर्क आया। बारिश के दिनों में कोई छाता नहीं रखना, भांग खाने के बाद खुराक नहीं लेना और दिन में दस-बारह चाय के कप उड़ेल लेने की आदत ने काका की तबियत पहले से ही बिगाड़ रखी थी। अब उनकी आदतों के कारण वे हॉस्पिटल में हैं तो कोई बड़ी बात नहीं। दो-चार दिन में आ ही जाएंगे, बुखार तो उन्हें अकसर रहता है। उनका बिमार पड़ना कोई दिलदहला देने वाली खबर नहीं थी।
उसी शाम रात आठ बजे के करीब हमारे एक पहचान के रिश्तेदार का मेरे मोबाइल पर फोन आया, दामू शांतिकाका नहीं रहे, विरार चल रहा है क्या। ये खबर दिलदहला देने वाली थी। कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। मम्मी को बताया तो उनकी हालत मुझसे भी ज्यादा खराब थी। थोड़ी ही देर बाद मैं और मम्मी चर्नी रोड स्टेशन पर लोकल ट्रेन में भीड़ कम होने का इंतजार कर रहे थे। काका अकसर रात 8:48 को विरार लोकल पकड़ते थे, भीड़ से खचाखच भरी वही 8:48 की लोकल हमारे सामने से निकल गई। हमने तकरीबन रात 9:30 की लोकल ली और 11 बजे तक विरार पहुंचे। काका ने एक दो बार अड्रैस बताया था, और विरार में रहने वाले हमारे दूसरे रिश्तेदारों की मदद से हम शांति काका के घर पहुंच गए।
बरामदे में काका का अकड़ा हुआ पार्थिव शरीर रखा हुआ था, और वहां गिनती के कुछ आठ-दस लोग मौजूद थे। खामोशी के बीच सुबह होने का इंतजार हो रहा था। रात भर बारिश हो रही थी। पूरा मूड ऑफ हो चुका था, काका को खामोश देखने की आदत नहीं थी।
काका के खयालों के बीच रात कट गई, पौ फटते ही आठ-दस रिश्तेदार और आ गए। हम लोग काका के अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट गए। अर्थी के लिए सीढि़यां गूंथने के बाद चार-पांच लोगों को बिल्डिंग के तीसरे माले से शांति काका का शरीर उठाकर नीचे लाना था। काका ने यहां भी ज्यादा लोगों का अहसान नहीं लिया, वजन हल्का होने के कारण दो ही लोग बॉडी उठाकर ले आए। शव यात्रा की तैयारी पूरी होने के बाद घर की औरतों ने कुछ अंतिम रस्में निभाई, और फिर कारवां चल दिया। रास्ते में सड़क के कुत्तों को देखकर काका के मोती की याद आ रही थी। दस मिनट में हम शमशान स्थल पर थे।
शमसान पहुंचने के बाद काका के शरीर को पहले से जमाई हुई लकड़ियों पर रखकर शरीर से उनके कपड़े हटाए गए। हड्डियों के ढांचे में काका एक दम फकीर की तरह लग रहे थे। उनकी बातें भी वैसी ही थी। थोड़ी देर बाद लोग उनकी परिक्रमा करने लगे। रस्म पूरी होने के बाद उनके बेटे ने मुखाग्नी दी और फिर सब लोग दूर खड़े हो गए। आग ठीक से नहीं लगने के कारण धुंआ बहुत उठ रहा था। शमसान भूमि के एक कर्मचारी ने अर्थी के पास खड़े लोगों से कहा कि चार-पांच किलो घी और उड़ेलना पड़ेगा, लकड़ियां आग नहीं पकड़ रही है। एक्सपायरी डेट का घी पूरे दामों में शमसान भूमि से ही खरीदा गया लेकिन घी उड़ेलने के बाद भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। मुझे शमसान की लकड़ियों से भी साजिश की बू आने लगी, कहीं जानबूझ कर तो गीली लकड़ियां नहीं दी गई। बहरहाल अंतिम दर्शन के लिए आए कुछ लोग राल का पाउडर छिड़कने की सलाह देने लगे। थोड़ी देर में शमसान कर्मचारियों द्वारा 60 रुपये प्रति किलो के भाव से पाउडर भी उपलब्ध करा दिया गया। पाउडर छिड़कते ही आग भभकती और फिर शांत हो जाती, जब तक पैकेट खत्म नहीं हुआ तब तक ऐसा चलता रहा। चालीस मिनट बीत जाने के बाद भी लकड़ियों ने आग नहीं पकड़ी, लोगों को काम पर जाने के लिए देर हो रही थी। आखिरकार शमसान कर्मचारी द्वारा सुझाए गए एक और उपाय पर सहमति बनी। रिवाजों को परे हटाते हुए मजबूरन लकड़ियों पर केरोसिन छिड़कने की बात मान ली गई। कर्मचारी का उपाय काम कर गया, केरोसिन छिड़कने के बाद लकड़िया जल उठी। अमेरिका अगर इराक पर हमला करेगा तो सबसे पहले उसके तेल के कुओं को जलाएगा लपटों के साथ जेहन में काका की बातें भी धूंआ-धूंआ सुलग रही थी।
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