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Jan 13, 2015

मकर संक्रांति

चल रे छोरे लूट ले मांझा
छत पे आये हीर और राँझा
बात-बात में पेच लड़ा है
पतंगों का ढेर पड़ा है

तपता सूरज आँख दिखाए
म्यूजिक और भी लाउड हो जाए
खाली फिरकी हाथ में लड्डू
चश्मा पहन के आया गुड्डू

अब्दुल मियां डोर बंधाये
सोणी शबनम थाप लगाये
हवा नहीं फिर भी कोशिश है
राहुल को ये कौन बताए

ढील देने से उड़ने लगेगी
डोर-डोर से जुड़ने लगेगी
अब्दुल चाचा ताक रहे थे
चार कबूतर झाँक रहे थे

थोड़ी देर मैं फंस गया मांझा
उंगली कटी तो दौड़ा राँझा
चुनरी लेकर हीर खड़ी थी
रांझे की तो निकल पड़ी थी

गली का बच्चा देख रहा था
कंकर पत्थर फ़ेंक रहा था
तार में उलझी सात पतंगे
"लूटने आ गए भूखे-नंगे"

नज़र बचाकर खूब उड़ाना
बच्चों का भी दिल बहलाना
जिनके पास नहीं है मांझा
उनकी फिरकी को भरवाना

तिल-गुड़ सी तुम करना बातें
दे देना कुछ आते-जाते
संक्रांति है बड़ा त्यौहार
अबकी बार, कुछ देना यार

#damukipoem

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