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Sep 16, 2014

भँवरे

ये काले कलूटे डरावने से भंवरे

अकसर बगीचों में

नज़र आयेंगे

फूलों पर मंडराते हुए


बरसों से वैज्ञानिकों ने

फूलों और भँवरे के इस मिलन को

विज्ञान से जोड़ दिया

चित्रकारों ने तस्वीरें बना दी

मंडराते हुए भँवरे की


जब भी कभी

भंवरों ने

हमारे घर के किसी कोने में

अपने घर बनाये

तब तुड़वा दिए हमने उनके मिट्टी के घर

यह कहकर कि

ऐसा होना अपशगुन होता है


हमने अकसर

अख़बार से झटककर मार डाला है

इन काले कलूटे डरावने से भंवरों को

कह दिया कि शोर बहुत करता है


#damukipoem

Jul 10, 2011

हादसा

डंक सी चुभती है जब कोई खबर
आँखों में पानी लाती है
सुर्ख लाल रंग लेकर
आखबारों में छप जाती है
ये मौत है या हत्या है या नियति
पता नहीं,
लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर
हादसा बन जाती है

दामोदर व्यास
-एक और रेल हादसा, कईयों की मौत 

Mar 27, 2010

इंसान

 

कांटो पर चलाना काम मेरा,
धरती की गोद में सोता हूँ,
मैं तो दीवाना हूँ यारों,
बस अपनी मौज में रहता हूँ ...

रिश्ते-नातों में उलझा नही,
पूरी दुनिया से मेरा नाता हैं,
सब लगते मुझको अपने से,
मेरा मज़हब यही सिखाता हैं,  
संग रहने से क्या होगा,
मैं सबके दिलो में रहता हूँ
मैं तो दीवाना हूँ यारो,
बस अपनी मौज में रहता हूँ...

कभी उड़ता हूँ बादल बनकर,
कभी बूंदों में ढल जाता हूँ
ग़मों का साया जहाँ भी हों,
वहाँ खुशियाँ बनकर जाता हूँ..
छोटी-छोटी बातों में ,
कभी हँसता हूँ, कभी रोता हूँ..
मैं तो दीवाना हूँ यारो,
बस अपनी  मौज में रहता हूँ..

मुझसे न पूछो नाम मेरा,
सब दिल वाला मुझको कहते हे,
पेड़-पौधे, नदिया-बादल,
सब साथ में मेरे रहते हैं..
धरती को माँ कहने वाला,
अब बेटा मैं इकलौता हूँ..
मैं तो दीवाना हूँ यारो,
बस अपनी मौज में रहता हूँ....

Mar 16, 2010

रिश्ते..


नूर- ऐ- इलाही, राम दुहाई
कैसे भी फरियाद करें
मंदिर उसका, मस्जिद उसकी
जहां चाहे उसको याद करें


बंज़र रिश्तो का क्या होगा
इसी सोच में सदियाँ बीत गयी
पानी उसका, धरती उसकी
वो चाहे जब बरसात करें


लकीरें खेल दिखाती हैं
कभी हाथों में, कभी सरहद पर
मिट्टी उसकी, किस्मत उसकी
वो चाहे जो हालात करें


मुझे उर्दू समझ में आती हैं
तू भी तो हिंदी जनता हैं
ये घर उसका, यह छत उसकी
चलो आओ मिलकर बात करें


एक दिल के दो टुकड़े करके
इसे हिंद कहा, उसे पाक कहा
सीना उसका, धड़कन उसकी
हम सबको जिंदाबाद करें....


दामोदर व्यास
२९। जनवरी। २०१०
मुंबई

Jan 1, 2010

इस बरस


बीती बातें भूल जाएँ, इस बरस,
बच्चा-बच्चा मुस्कुरायें, इस बरस,
ना किसी का घर जलें और ना बहें
बस, रोशनी ही नज़र आयें, इस बरस

भारत ही भारत नाम हो, इस दुनिया में,
सबके मन में राम हो, इस दुनिया में
सीता का ना ही हरण हो - वनवास हो,
"आतंक की लंका" जीत जाये, इस बरस

"लता" की आवाज़ हम सुनते रहें,
"ओबामा" जैसी क्रांति को, चुनते रहें,
"जैक्सन" जैसी मौज, फिरसे आएगी,
"सचिन" फिर सरताज होगा, इस बरस

बच्चो के, कंधो से हो थोडा, बोझ कम,
नाचे-गाए-हँसते जाए, हर कदम,
ये आने वाला कल हैं, इतना जान लो,
इन्हें भूल से भी, ना रुलाये, इस बरस

दिल से दिल की बात को, खुलकर कहें,
दुश्मनी को भूल, हम मिलकर रहें,
जहां भी हो, चैन-ओ-अमन की बात हो,
"दीप" तू भी लिखता जाए, इस बरस

Nov 6, 2008

अखबार



सोमवार से रविवार तक,  कैसी खबरें लाता है...
ये अखबार, जो रोज़, मेरे घर पर आता है..

जलती रेलें, खोते जहाज़ और भी कुछ...
बनते रिश्ते, रश्म-ओ-रिवाज़ और भी कुछ..
उटपटांग सी खबरों को,  हेडलाइंस बनाता है...
ये अखबार, जो रोज़, मेरे घर पर आता है..

कहीं आंसू से भीगा, कहीं खून से लाल हाय राम..
कहीं शोक संदेश, कहीं माया का जाल हाय राम...
चाय की चुस्की लेते-लेते, मेरा जी घबराता है..
ये अखबार, जो रोज़, मेरे घर पर आता है...

ओलम्पिक में बस एक मेडल, चलो ठीक है...
इंडिया-ऑस्ट्रेलिया, ड्रा पे सेटल, चलो ठीक है...
पर होकी, कबड्डी, खो-खो को, क्यों सुर्खिया नहीं बनाता है...
ये अखबार, जो रोज़, मेरे घर पर आता है...

किंग खान और करन जोहर, फ्रांस में शूट पर बिजी है...
शाहिद ने नयी फिल्म साइन की, करीना थोड़ी चूजी है...
एक अरब के देश को, क्या फालतू बातें सुनाता है...
ये अखबार, जो रोज़, मेरे घर पर आता है....

आज हाथ से, कल फूल पर, घर बदले...
नरम मुलायम, उछले लालू, नटवर बदले...
माया, उमा और जाया जैसी, देवी के रूप दिखाता है...
ये अखबार, जो रोज़,  मेरे घर पर आता है...

* This poems is a direct comment on today's electronic and some print media

Nov 5, 2008

बेबसी..

हालत मेरी बिगड़ दे मौला,
बगिया मेरी उजाड़ दे मौला,
जो भी दे किश्तों में मत दे,
ग़मों का छप्पर फाड़ दे मौला....

खुद तो माखन मिश्री खाता,
कितने सारे रूप बनाता,
कभी रोटी बन, थाली में आजा,
या मेरा चूल्हा उखाड़ दे मौला..

सूखे बर्तन, गीले बिस्तर,
अब आकर जल्दी ही कुछ कर,
या तो सुख की गगरी भर दे,
या दुःख की कोई "तिहाड़" दे मौला..

बच्चे मेरे खेलने जाए,
मिट्टी के भगवान बनाये,
उनके सपनो में रंग भर दे,
या फिर उन्हें, लताड़ दे मौला..

कैसे अब मैं मूंह ना खोलूं,
क्यों तेरे आगे-पीछे डोलू,
या तो अब तू ही कुछ कह दे,
या मेरे मूंह पे  *किवाड़ दे मौला..

*किवाड़= दरवाजा (This is marwadi word)

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