Nov 14, 2011

ये रात रात में ही क्यों आती हैं

फलक पर ये कौनसा चेहरा बन रहा है
रात के सन्नाटे में
ये ख़ामोशी क्या कह रही है..

ये चाँद क्यों आँख मिचौली कर रहा है..
ये हवाएं क्यों उड़ा रही है ,
मेज पर रखी किताब के पन्ने..

ये नदी बहकर किस और जा रही है
इतनी रात को..
लगता है ,
रात भर कायनात कोई साजिश कर रही है..

दहलीज पर सुबह की दस्तक होते ही,
सभी अपने घरों में चले जाते हैं..

ये रात सुबह को कहाँ चली जाती है
ये रात रात में ही क्यों आती हैं...

( 14th November, 2011 : 2.47AM )

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