Nov 12, 2011

अरसा बीत गया
धम्म से जमीं पर पाँव पटके हुए
सालों से हाथ छिटक कर
किसी से रूठा नहीं मैं..

अब कोई नहीं छीनता पेंसिल मेरी,
और ना ही मैं किसी का पन्ना फाड़ता हूं

टीचर, क्लास, बेंच और पनिशमेंट
सब कुछ गुल हो गया हैं
जब से आँखों पर
सीरियसनेस का चश्मा चढ़ा है..

चल यार एक काम कर
कभी यूं ही आजा मेरे घर पे
दोपहर में, दरवाजा नोक किए बिना..
टल्ली मार कर गिरा दे पानी
मेरे काम की सभी फाइलों पर..

खोपरे की गोली लेकर आना,
मैं जीना चाहता हूं बचपन को
एक बार फिर से....
(Happy children's day)
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