Dec 2, 2007

कभी-कभी


शहर की भीड़ से कौसो दूर..
याद हाथ पकड़ कर खींच लेती हैं..
जब भी लोकल की भीड़ देखता हूँ
तब गंगुराम के भेड़ों के टोले की याद आती हैं..

कटिंग चाय की सी ज़िन्दगी में..
मेरे गाँव का ख्याल भर ही....
शक्कर की सी मिठास घोल देता हैं..
मिट्टी  पानी..... चंदू काका की लड़की
पनघट और न जाने कितनी बातें....

ये बातें खयालो का तूफ़ान लाती हैं...
लेकिन रहती नहीं.....

दो हज़ार के भूकंप ने..
 मेरा गाँव तबाह किया.....
और चर्चगेट पहुचते,
मेरा ही ख्याल भी........

गाँव की तरह.....
कही खो गया... 
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